जनता के करोड़ों का ‘मज़ाक’: दिल्ली के  ओवरब्रिज और सड़कों पर मौत का साया

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कें चौड़ी हो रही हैं, नए और भव्य फ्लाईओवर बन रहे हैं, मानो शहर खुद को एक वैश्विक महानगर के रूप में प्रस्तुत करने को आतुर हो। इसी महत्वाकांक्षा के तहत, पैदल चलने वालों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए, करदाताओं के करोड़ों रुपये खर्च कर दर्जनों आधुनिक फुट ओवर ब्रिज (FOB) बनाए गए हैं। इन संरचनाओं को ‘दिव्यांग-अनुकूल’ और ‘सर्व-सुलभ’ बनाने के दावे के साथ, इनमें अत्याधुनिक लिफ्ट और एस्केलेटर भी लगाए गए।

मगर, धरातल पर जो सच्चाई उभरकर सामने आ रही है, वह प्रशासन के दावों को बेदर्दी से झूठा साबित कर रही है और जनता के पैसों का घोर दुरुपयोग दर्शा रही है। दिल्ली के ये ‘आधुनिक’ फुट ओवर ब्रिज आज आम जनता, विशेषकर बुजुर्गों, दिव्यांगों और बच्चों के लिए किसी सज़ा से कम नहीं हैं, बल्कि एक दुखद और महंगा मज़ाक बन चुके हैं।

हकीकत यह है कि राजधानी के अधिकांश फुट ओवर ब्रिजों पर लिफ्टें या तो निष्क्रिय पड़ी हैं, उन पर बड़े-बड़े ताले लटके हैं, या फिर वे चोरों और तोड़फोड़ करने वालों का शिकार हो चुकी हैं। कई जगहों पर तो यह विडंबना देखने को मिलती है कि लिफ्टें ‘ऑफिस टाइम’ में ही बंद कर दी जाती हैं, जिससे सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद – बुजुर्ग, विकलांग, और भारी सामान लेकर चलने वाले यात्री – इन ऊँची-ऊँची सीढ़ियों का उपयोग करने की बजाय, अपनी जान जोखिम में डालकर, जानलेवा भीड़-भरी सड़कों को पार करने पर मजबूर हैं। यह केवल एक तकनीकी या रखरखाव की समस्या नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक अवसंरचना के प्रति प्रशासन की गहरी उदासीनता और करदाताओं के करोड़ों रुपये के घोर दुरुपयोग का जीता-जागता प्रमाण है। जिन सुविधाओं के लिए भारी-भरकम राशि खर्च की गई, वे आज धूल फांक रही हैं और दिल्ली को ‘दिव्यांग-अनुकूल’ बनाने के सभी सरकारी दावों को खोखला साबित कर रही हैं।

‘विकलांग’ अवसंरचना का जाल: पहुँच और सुरक्षा का संकट

भारत की राजधानी और एक वैश्विक शहर बनने की आकांक्षा रखने वाली दिल्ली में, बुनियादी सार्वजनिक अवसंरचना की यह दयनीय स्थिति एक गंभीर और नैतिक चिंता का विषय है। कम से कम 10 प्रमुख फुट ओवर ब्रिजों (FOB) की स्थिति ‘विकलांग’ (अक्षम) के रूप में चिन्हित की गई है, जहाँ लिफ्ट या एस्केलेटर या तो लगातार खराब, स्थायी रूप से बंद, या पूरी तरह से अनुपस्थित हैं।

इस निष्क्रियता का सबसे बड़ा शिकार वो वर्ग है, जिसके लिए ये ब्रिज सबसे ज़्यादा बनाए गए थे: बुजुर्ग, दिव्यांग, और छोटे बच्चे। उनके लिए, ये ऊँचे ब्रिज ‘सुरक्षा’ का समाधान नहीं, बल्कि दुर्गम ‘पहाड़’ बन गए हैं।

निष्क्रिय लिफ्टों का भयावह सच:

दिल्ली के सबसे व्यस्त चौक-चौराहों पर लिफ्टों का गैर-कार्यशील होना अब एक नियम बन गया है, अपवाद नहीं। आश्रम चौक जैसा दिल्ली का सबसे व्यस्त चौराहा, जहाँ नया अंडरपास बनने से यातायात का दबाव और बढ़ा है, वहाँ के ओवरब्रिज पर लगी लिफ्टें और एस्केलेटर लगातार खराब रहते हैं, जिससे पैदल यात्रियों की सुविधा बाधित होती है। इसी तरह, चिराग दिल्ली में भी लिफ्ट लगाने के कुछ ही दिनों बाद खराब हो गई और उसके बाद कभी भी सुचारू रूप से नहीं चली, जिससे वह संरचना मात्र एक दिखावा बनकर रह गई।

सबसे अधिक निराशाजनक स्थिति वे हैं जहाँ लिफ्टें लगाई तो गईं, लेकिन वे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में निष्क्रिय हैं। ओबेरॉय होटल फ्लाईओवर (मथुरा रोड) के पास लिफ्ट तो खड़ी है, लेकिन उसे चलाने के लिए बिजली ही नहीं है। इस ब्रिज का महत्व इसलिए भी और बढ़ जाता है क्योंकि इसके ठीक पास एक दृष्टिबाधितों का स्कूल है, और लिफ्ट के न चलने से इसकी उपयोगिता शून्य हो जाती है, जो ‘दिव्यांग-अनुकूल’ राजधानी के दावे पर एक करारा तमाचा है।

अनुपलब्धता, अवरोध और चोरी की त्रासदी

नागरिकों की सुविधा के लिए बनी ये संरचनाएँ कई जगहों पर अवरोध बन गई हैं। नोएडा लिंक रोड (मयूर विहार-मयूर एक्सटेंशन) के बीच बने FOB पर, लिफ्टों को चोरी और तोड़फोड़ से बचाने के नाम पर लोहे की ग्रिल लगाकर बंद कर दिया गया है। यह सुरक्षा का उपाय कम और दिव्यांगों के लिए पहुँच का निषेध अधिक बन गया है। इस तालेबंदी ने लिफ्ट को आम जनता, विशेषकर व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं, की पहुँच से हमेशा के लिए बाहर कर दिया है।

वहीं, भीष्म पितामह मार्ग (लोधी कॉलोनी) के पास का पुराना स्ट्रक्चर और हसनपुर बस डिपो के सामने का ब्रिज ऐसे उदाहरण हैं जहाँ लिफ्ट के लिए जगह होने के बावजूद कभी लिफ्ट लगाई ही नहीं गई। कालकाजी मंदिर (आउटर रिंग रोड) पर खराब लिफ्ट के साथ-साथ, रैंप तक पहुँचने के लिए भी ग्रिल लगा दी गई है, जो व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए एक और गंभीर बाधा खड़ी करती है, यह साबित करते हुए कि PWD की योजना में दिव्यांगजन शायद सबसे निचले पायदान पर हैं।

सड़कों पर मंडराता ‘मौत का खतरा’: सुरक्षा का संकट

इन ‘विकलांग’ FOBs का सीधा और घातक असर पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। लिफ्ट, एस्केलेटर, या सुलभ रैंप की अनुपस्थिति में, हजारों यात्री, जिनमें बड़ी संख्या में बुजुर्ग और बच्चे शामिल हैं, सीढ़ियाँ चढ़ने की शारीरिक परेशानी से बचने के लिए या मजबूरी में, भारी ट्रैफिक के बीच से सड़क पार करने का जानलेवा जोखिम उठाते हैं।

सुंदर नगर में FOB के गैर-कार्यशील होने के कारण पैदल यात्री दिल्ली चिड़ियाघर चौराहे पर यातायात की गति को बाधित करते हुए सड़क पार करते हैं, जिससे न केवल यातायात जाम होता है बल्कि पैदल चलने वालों और तेज़ रफ़्तार वाले वाहनों दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा होता है।

मोदी मिल फ्लाईओवर के पास स्काईवॉक और पंजाबी बाग (रिंग रोड) जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर भी खराब लिफ्टें यात्रियों को तेज़ रफ़्तार वाली सड़कों को पार करने के लिए विवश करती हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। फुट ओवर ब्रिज का मूल उद्देश्य पैदल यात्रियों, विशेष रूप से शारीरिक रूप से अक्षम लोगों, को सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से सड़क पार करने में मदद करना है, लेकिन जब लिफ्टें ही काम नहीं कर रही हैं, तो ये ब्रिज केवल पहुँच का एक दिखावा बनकर रह जाते हैं, जो जनता के पैसे पर बनी एक विशाल, अनुपयोगी सीढ़ी से अधिक कुछ नहीं है।

PWD का ढुलमुल रवैया और कोर्ट के आदेश की अवमानना

फुट ओवर ब्रिज और उनमें लगी लिफ्टें जनता की सुविधा के लिए करोड़ों रुपये के खर्च से बनाई गई हैं, जो करदाताओं के पसीने और खून की कमाई है। PWD के एक आंकड़े के अनुसार, दिल्ली में लगभग 115 FOB हैं। 2018 की एक प्लानिंग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में यह भयावह तथ्य सामने आया था कि दिल्ली के 77% FOB में लिफ्ट नहीं थी, और केवल 23% में ही एस्केलेटर थे। नए ब्रिजों पर लिफ्ट और एस्केलेटर लगाने का खर्च करोड़ों रुपये में आता है – एक FOB की लागत 2 से 4 करोड़ रुपये तक हो सकती है, जिसमें लिफ्ट और एस्केलेटर का खर्च अलग से जुड़ता है।

सवाल यह है कि जब लिफ्टों को चलने के लिए स्थायी बिजली नहीं मिल रही, या वे थोड़े ही समय में खराब हो जा रही हैं, या उन पर ताले लटके हैं, तो क्या यह सीधे तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है? एक नागरिक का प्रश्न बेहद जायज़ है: “जब लिफ्ट और एस्केलेटर लगाने में करोड़ों खर्च किए जा सकते हैं, तो उनकी सालाना रखरखाव और सुचारु संचालन पर सही खर्च क्यों नहीं किया जाता? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि ये ब्रिज केवल कागज़ों पर ‘आदर्श’ दिखाने के लिए हैं, ज़मीन पर नहीं?”

चोरी और तोड़फोड़ की घटनाओं को रोकने में प्रशासन की विफलता भी इस बर्बादी में योगदान देती है। जहांगीरपुरी जैसे इलाकों में FOB की लिफ्टों का कीमती सामान चोरी होने की खबरें आती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि इन महत्वपूर्ण सुविधाओं की सुरक्षा के लिए न तो कोई स्थायी गार्ड है और न ही प्रभावी निगरानी प्रणाली (CCTV) काम कर रही है। महंगे स्टील गार्ड रेल चोरी हो रहे हैं, लेकिन PWD का दावा है कि उनके पास सुरक्षा के लिए संसाधन नहीं हैं।

इससे भी बड़ी बात यह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2024 में शहर के FOBs की “दयनीय स्थिति” को लेकर PWD की कड़ी आलोचना की थी, यह कहते हुए कि वे इतने खराब हैं कि एक स्वस्थ व्यक्ति भी उनका उपयोग नहीं कर सकता। अदालत ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि ओवरब्रिज विकलांगों के अनुकूल (disabled-friendly) हों, जिसके लिए लिफ्ट और एस्केलेटर अनिवार्य हैं। PWD ने कोर्ट को मरम्मत और बदलाव करने का आश्वासन दिया, लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि न्यायालय के आदेशों को भी नज़रअंदाज़ किया गया है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016′ (Rights of Persons with Disabilities Act 2016) स्पष्ट रूप से सार्वजनिक सुविधाओं पर लिफ्ट या एस्केलेटर अनिवार्य करता है। इन सुविधाओं के बंद होने से, दिल्ली का सार्वजनिक बुनियादी ढांचा इस राष्ट्रीय अधिनियम का घोर उल्लंघन कर रहा है।

उदासीनता का चक्र और जिम्मेदार कौन?

फुट ओवर ब्रिजों का निर्माण और रखरखाव मुख्य रूप से लोक निर्माण विभाग (PWD) की जिम्मेदारी है। कई मौकों पर, PWD ने लिफ्टों के खराब होने का दोष चोरी, तोड़फोड़, और बिजली की कमी पर मढ़ा है। लेकिन जनता पूछती है:

  1. चोरी क्यों हो रही है? क्या लिफ्टों की सुरक्षा के लिए स्थायी गार्ड या CCTV कैमरे नहीं लगाए जा सकते, जैसा कि मेट्रो स्टेशनों पर किया जाता है?
  2. बिजली क्यों नहीं है? क्या बैकअप पावर (UPS/Generator) या सौर ऊर्जा (Solar Power) का विकल्प नहीं अपनाया जा सकता, ताकि लिफ्ट 24×7 चल सके?
  3. ऑफिस टाइम’ में लिफ्ट क्यों बंद होती है? यह शिकायत कई जगहों से आई है। क्या जानबूझकर सरकारी उदासीनता के कारण लोगों को असुविधा दी जा रही है?

उदासीनता का चक्र कुछ इस प्रकार चलता है: नागरिक शिकायत करते हैं। विभाग ‘जल्द ही मरम्मत’ का आश्वासन देता है। मरम्मत या तो कभी नहीं होती, या होती भी है तो कुछ दिनों में लिफ्ट फिर बंद हो जाती है। अंतिम सत्य यह है कि जनता थक-हारकर सड़क पार करने लगती है, और करोड़ों रुपये की सुविधा केवल सीढ़ियों का एक ढेर बनकर रह जाती है।

आगे की राह: दिखावा नहीं, जिम्मेदारी चाहिए

यह लेख केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि दिल्ली के नागरिकों की एक सामूहिक चीख है। दिल्ली को ‘दिव्यांग-अनुकूल’ राजधानी बनाने के लिए, PWD और संबंधित एजेंसियों को इन FOBs के रखरखाव और सुचारु संचालन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिए नियमित निरीक्षण, त्वरित मरम्मत, और स्थायी बिजली कनेक्शन सुनिश्चित करना आवश्यक है।

  • सुरक्षा का समाधान: लिफ्टों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे गार्ड या स्थायी CCTV निगरानी प्रणाली स्थापित करना।
  • बिजली का समाधान: सभी लिफ्टों को ग्रिड से स्थायी कनेक्शन देना और पावर आउटेज की स्थिति के लिए सौर ऊर्जा या मजबूत बैटरी बैकअप प्रदान करना।
  • जवाबदेही: एक केंद्रीकृत शिकायत और ट्रैकिंग प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जिससे पता चल सके कि किस FOB पर लिफ्ट कितने समय से बंद है और संबंधित अधिकारी कौन है, ताकि उनकी जवाबदेही तय की जा सके।

लिफ्ट नहीं, तो ब्रिज किस काम का?’ यह सवाल केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि करदाताओं की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने की मांग है, जिसके बिना ये संरचनाएँ अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकतीं। जब तक PWD और संबंधित एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी नहीं निभातीं, तब तक दिल्ली के फुट ओवर ब्रिज ‘पैदल चलने वालों का स्वर्ग’ नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के खर्च से बनी ‘सीढ़ियां’ ही बने रहेंगे, जो विकलांगों, बुजुर्गों और आम जनता के लिए किसी सज़ा से कम नहीं हैं। यह जनता के पैसे की बर्बादी है जिसे तुरंत रोकना होगा।

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