सोचा नहीं था
सोचा नहीं था
ज़िदगी इतनी हसीन और ग़मगीन है
यह भी नहीं सोचा था
चेहरे के पीछे
कितने चेहरे छिपे हैं
पर कुछ तो है
जो साफ साफ दिखाई नहीं देता
या यूं कहे
कि कोई भी चेहरा
एक दूसरे को साफ साफ
देख नहीं पाता
सभी चाहते हैं
एक दूसरे से कुछ ना कुछ पाना
और ज़िदगी बन जाती है
इच्छाओं का ताना बाना।
गणेश दास अरोड़ा
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