बेटी की शादी में आ रही रुकावटें होंगी दूर, मिलेगा मनचाहा वर

पति प्राप्ति के लिए चमत्कारी पार्वती स्तोत्र

Pati Prapti Parvati Stotra: हिंदू धर्म में माता पार्वती को सौभाग्य, विवाह और दांपत्य सुख की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। यदि किसी कन्या के विवाह में बार-बार देरी हो रही हो या योग्य वर नहीं मिल पा रहा हो, तो पार्वती स्तोत्र का नियमित पाठ अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी अविवाहित कन्या या अभिभावक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उन पर माता पार्वती की विशेष कृपा होती है और विवाह संबंधी बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं।

पति प्राप्ति पार्वती स्तोत्र के लाभ

• विवाह में हो रही देरी दूर होती है
• योग्य और मनचाहा वर प्राप्त होता है
• दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है
• सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

पति प्राप्ति पार्वती स्तोत्र पाठ के नियम

• अविवाहित कन्या स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
• माता पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें
• घी का दीपक जलाकर फूल-फल अर्पित करें
• शांत मन और पूर्ण श्रद्धा से स्तोत्र का पाठ करें
• पाठ शुक्रवार या सोमवार के दिन विशेष फलदायी माना जाता है

जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम्

जानकी उवाच:

शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये।
सदा शंकरयुक्ते च पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥1॥
सृष्टिस्थित्यन्त रूपेण सृष्टिस्थित्यन्त रूपिणी।
सृष्टिस्थित्यन्त बीजानां बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥2॥
हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे।
पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥3॥
सर्वमंगल मंगल्ये सर्वमंगल संयुते।
सर्वमंगल बीजे च नमस्ते सर्वमंगले॥4॥
सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्व अशुभ विनाशिनी।
सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शंकरप्रिये॥5॥
परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि।
साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥6॥
क्षुत् तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृतिः क्षमा।
एतास्तव कलाः सर्वा नारायणि नमोऽस्तु ते॥7॥
लज्जा मेधा तुष्टि पुष्टि शान्ति संपत्ति वृद्धयः।
एतास्त्व कलाः सर्वा सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥8॥
दृष्टादृष्ट स्वरूपे च तयोर्बीज फलप्रदे।
सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोऽस्तु ते॥9॥
शिवे शंकर सौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि।
हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवी नमोऽस्तु ते॥10॥
स्तोत्रेणानेन याः स्तुत्वा समाप्ति दिवसे शिवाम्।
नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम्॥11॥
इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम्।
दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम्॥12॥

॥ श्री ब्रह्मवैवर्त पुराणे जानकीकृतं पार्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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