पिता की आज्ञा या ममता का बलिदान? जानिए क्यों भगवान परशुराम ने अपनी ही मां का सिर काट दिया था
भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जीवन शौर्य, न्याय और तपस्या का प्रतीक माना जाता है। लेकिन उनके जीवन की सबसे रहस्यमयी और चौंकाने वाली घटना तब सामने आती है, जब उन्होंने अपने पिता की आज्ञा पर अपनी ही माता माता रेणुका का सिर काट दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि एक पुत्र को इतना कठोर निर्णय लेना पड़ा?
भगवान परशुराम को उनके अदम्य साहस और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जाना जाता है। लेकिन उनकी कथा का यह प्रसंग आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या पिता की आज्ञा धर्म से ऊपर हो सकती है, या फिर यह कर्तव्य की सबसे कठिन परीक्षा थी।
महर्षि जमदग्नि का क्रोध
पद्म पुराण के सृष्टि खंड के अनुसार, परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि महान तपस्वी थे और माता रेणुका एक आदर्श पतिव्रता। एक दिन माता रेणुका नदी से जल लेने गईं, जहां उन्होंने गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करते देखा। उस दृश्य से उनका मन क्षणभर के लिए विचलित हो गया, जिससे आश्रम लौटने में देरी हो गई।
महर्षि जमदग्नि ने अपनी योगशक्ति से यह जान लिया और इसे मर्यादा का उल्लंघन मानते हुए अत्यंत क्रोधित हो उठे।
पिता की कठोर आज्ञा
क्रोध में आकर महर्षि जमदग्नि ने अपने बड़े पुत्रों को माता रेणुका का वध करने का आदेश दिया। लेकिन भाइयों ने ममता और धर्म के कारण इस आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर महर्षि ने उन्हें पत्थर के समान होने का श्राप दे दिया।
इसके बाद उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को बुलाकर माता और भाइयों के वध की आज्ञा दी।
परशुराम का कठिन निर्णय
परशुराम के सामने एक ओर मातृ-हत्या जैसा महापाप था, तो दूसरी ओर पिता की आज्ञा। उन्होंने यह समझा कि पिता की तपोशक्ति के सामने अवज्ञा करने पर स्थिति और भी भयावह हो सकती है। यह सोचकर कि आज्ञा का पालन करने पर पिता प्रसन्न होंगे और वरदान के माध्यम से माता को पुनः जीवित कराया जा सकता है, उन्होंने भारी मन से अपने परशु से माता और भाइयों का वध कर दिया।
वरदान से लौटी जीवन की सांस
पुत्र की अटूट पितृ-भक्ति से प्रसन्न होकर महर्षि जमदग्नि ने परशुराम को तीन वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने बुद्धिमानी से—
माता रेणुका को पुनः जीवित करने
भाइयों की चेतना लौटाने
उन्हें मृत्यु की स्मृति न रहने देने
का वरदान मांगा। महर्षि ने ‘तथास्तु’ कहा और माता रेणुका तथा उनके भाई पुनः जीवित हो उठे।
धर्म और कर्तव्य की मिसाल
इस प्रकार भगवान परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन भी किया और अपनी माता को भी पुनः जीवन दिलाया। यह कथा सनातन धर्म में कर्तव्य, त्याग और विवेक की सबसे कठिन परीक्षा का प्रतीक मानी जाती है।







